“शुद्र द रायजिंग” : बाबासाहब के संशोधन की हत्या
(दिनांक १८/१०/२०१२ को मराठी न्यूज़पेपर महानायक में प्रसिद्द लेख का
भाषांतरित विस्तार)
साथ ही पढ़ें www.shudramovie.blogspot.in
मुंबई के कुछ लोगों को ‘शुद्रा’ पिक्चर २३
फरवरी २०१२ को संजीव जैस्वाल (शुद्र पिक्चर का निर्माता) ने उसके चार बंगला,
अँधेरी, मुंबई में ‘रुद्राक्ष’ ऑफिस में दिखाई थी. जिसमें से मैं भी एक था. उसीसमय
फिल्म की आपत्तिपूर्ण बातों से संजीव जैस्वाल को अवगत कराया गया था. (उसे लिखे गये
पत्र की प्रति www.shudramovie.blosgspot.in पर
उपलब्ध है.) लेकिन उसने सुधारना करने से इंकार करते हुए पिक्चर १४ एप्रिल २०१२
(बाबासाहब की जयंती) को रिलीज करना घोषित किया था. उसी वक्त ‘ब्लिस’ ने
प्रधानमंत्री, सांसकृतिक मंत्री, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, डीआईजी, सेन्सर बोर्ड,
सभी को पत्र लिख कर पिक्चर रिलीज ना करने
के लिये बिनती की थी. शायद इस वजह से ये यह पिक्चर अब तक रिलीज नहीं हो पाई.
पिक्चर की
आपत्तिपूर्ण बातें इसप्रकार है. यह फिल्म पूरी तरह से बाबासाहब की ‘’हु वेर
शुद्रा?’’ इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ के विरोध में होकर बाबासाहब के मौलिक
संशोधन की निर्मम हत्या करती है. विशेषत: इस फिल्म के माध्यम
से ओबीसी समाज को अँधेरे में रखकर भारत को बरबाद करने की आरएसएस
की साजिश को मजबूत करने का काम किया जा रहा है. भारत में विभिन्न आंबेडकारी
गतिविधियों के कारण आज ओबीसी बंधू जागृत होकर उसे खुद की पहचान होने लगी है और
उसके कदम बौद्ध धर्म की और बढ़ने लगे है. आरएसएस ने इसे अच्छी तरह से पहचान लिया
है. इसलिए, भारतीय जनता को भ्रमित रखे जाने के लिये सविधान को अयोग्य ठहराना,
गरीबी हटाओ प्रोग्राम, भ्रष्टाचार हटाओ इस तरह के कार्यक्रम चलाये जाते है. उसमें
‘अन्ना हजारे’ को सम्मुख रख आरएसएस ने चलाया हुआ ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ का खेल सबसे
प्रभावी था. उससमय भी अंबेडकरी नेता भी झांसे मैं आ गये थे. सबसे मुर्ख नेता सबसे
पहले ही बलि चढ़ जाता है. संभ्रमित नेता व्यर्थ बडबड करता है, तो गिरवी रहा नेता
चुप बैठता है. लेकिन जनता पूरी तरह से नैराश्य और असहाय की अवस्था में रहती है. योग्य
विरोध करने वाले और आंदोलन करने वाले व्यक्ति को भी जनता साथ नहीं देती.
इसी तरह से शुद्रा
फिल्म की भी परिस्थिति है. इस फिल्म मैं अस्पृश्य /अतिशूद्र लोंगों को शुद्र कहकर
प्रद्रशित किया गया है. उसमें ब्राहमनी या मनुस्मृती द्वारा किये गये अत्याचार के
प्रकार जैसे कमर मैं झाड़ू और गले मैं मटका लटकाया हुआ दर्शाया गया है. वास्तव में
ये लोग अतिशूद्र है. जबकि अतिशूद्र ब्राहमणों की वर्ण व्यवस्था के बाहर के लोग है.
वे हिन्दू भी नहीं थे. जब आर्य भारत में आये तब केवल तिन ही वर्ण साथ लाये थे.
उनमे चौथा वर्ण शुद्र नहीं था. शुद्र ये बाहर से आये है. आर्यों के आपसी झगड़ो के
कारण बहिष्कृत किये हुए लोगो के लिये यह चौथा वर्ण निर्माण किया गया था. जिनके
लिये मनुस्मृती में कठोर शिक्षायें जारी की गयी थी. ऐसा बाबासाहब ने “हु वेर
शुद्रा” मैं संशोधित किया है. चारों वर्णों के लोगों का हिन्दू नामकरण भी नहीं
हुआ. कुछ काल के बाद केवल ब्राहमण और शुद्र ही भारत में शेष रहे. मूलनिवासी एवं बौद्ध
धर्म के लोगों ने ब्राह्मणी धर्म अर्थात हिंदू धर्म अपनाने से इंकार किया. इसलिय
उनपर भी मनुस्मृती में शुद्रों के लिये निर्धारित शिक्षायें लादी गई. जब बौद्ध
धर्म नष्ट करने में मनुवादी सफल हो गये तब उन्होंने इन लोंगों पर कहर ढाया. पेशवा
राज में इनके कमर मैं झाड़ू बंधवाया गया और गले मैं मटका. ये लोग अस्पृश्य कहलाये. अतिशूद्र
या अस्पृश्य कौन समझने के लिये बाबासाहब का ‘’अस्पृश्य मूल में कौन थे और वे
अस्पृश्य कैसे बने?” यह ग्रंथ समझना होगा.
कालांतर में शुद्रों ने ब्राहमणों का ब्राहमनी धर्म अपना लिया. लेकिन
अतिशुद्रओं नहीं अपनाया. वे गाँव के बाहर सीमा पर रहे या जंगल में चले गये. समय के
चलते अतिशूद्रों ने इस्लाम और क्रिश्चन धर्म अपनाया और बचे हुए ब्राहमी धर्म में
शामिल हुये. मजे की बात तो ये है की जिस समय जिस धर्म का वर्चस्व रहा, उस काल में
ब्राहमण बड़ी संख्या में उस धर्म में शामिल हो जाते थे और उस धर्म में धर्मगुरु या
ऊँचे पदों पर असिन होकर उस धर्म को बर्बाद करते गये, चाहे वह मुस्लिम धर्म हो,
क्रिश्चन धर्म हो या बौद्ध धर्म.
वर्तमान काल में शुद्र भारत में ओबीसी वर्ग में आते है और अतिशूद्र
एससी, एसटी, डीटी एनटी, वीजे एनटी में गिने जाते है. मुसलमानों के बढ़ते धर्मान्तर
को रोकने के लिये ब्राहमणों ने घबराकर या फिर अपना वर्चस्व बनाने के लिये शुद्रों
पर अत्याचार कम किये. शुद्रों को ब्राहमनी धर्म में शामिल किये जाने पर उनपर के
अत्याचार कम होकर उन्हें प्रगति के अवसर प्राप्त हुए और उन्हें उच्चवर्णीय कहा
जाने लगा. इन शुद्रों ने फिर ब्राहमणों के साथ मिलकर अतिशुद्रो पर मनुस्मृती लागु
की. ब्राहमणों का यह षड़यंत्र होता है की शुद्रों को यह कभी पता न चले की वे शुद्र
थे. वे हमेशा इस भ्रम रहे कि, या तो वे वैश्य थे या क्षत्रिय. अगर शुद्रों को इस
रहस्य का पता चला की वे शुद्र में गिने जाते थे और उनपर मनुस्मृती के अनुसार
अत्याचार होते रहने के कारन उनकी आज ख़राब हालत है तो वे ब्राहमणों के खिलाप बगावत
कर उठेंगे.
और सच तो यह है की ऐसा ही हुआ है. आज बाबासाहेब को पढ़कर ओबीसी समाज
ब्राहमणों का षड़यंत्र समझने मैं कामयाब हो रहा है और ब्राहमनी धर्म से निकलकर बाहर
आ रहा है. कईयों ने बौद्ध धर्म भी अपनाना शुरू किया है. इसीकारण ब्राहमणों इतने सालों
बाद, पहली बार साल २०११ में जागितक स्थर पर ब्राहमनी संमेलन आयोजित किया. इसी
षड़यंत्र की एक कड़ी ‘शुद्र द रायजिंग’ फिल्म का बनाया जाना है. इस फिल्म के
प्रदर्शन से सच्चा शुद्र यह जान नहीं पायेगा की वह शुद्र है. उसके दिमाग में यह
बात घर कर जायेगी की शुद्र वे लोग है जो भूतकाल में कमर में झाड़ू और गले में मटका
लटकाते थे. और वर्तमान काल में ये लोग आंबेडकर को मानने वाले, जयभीम बोलने वाले
लोग है. दूसरी ओर ब्राहमण इस फिल्म से यह साध्य करना चाहता है कि अतिशूद्र का भी
यह भ्रम विश्वास में बदल जाये कि वे शुद्र है. और वास्तव में हुआ यही है. भारत के
अतिशूद्र और अछूत लोग इस फिल्म को प्रदर्शित करवाने के लिये एडीचोंटी का जोर लगाकर
आरएसएस के नुमाईंदे संजीव जैसवाल की मदत कर रहे है.
वैसे अतिशुद्रोने बड़ी संख्या में बाबासाहब को अपनाने के कारण उन्हें
एहसास हो चूका है कि उनकी वर्तमान अवस्था ब्राहमनी जातिव्यवस्था और पीड़ित रखे जाने
के कारण ही हुई है. लेकिन शुद्र समाज को आज यह एहसास होना तो दूर, जानकारी भी नहीं
है कि उनके शोषण का कारण ब्राहमनी जातिव्यवस्था या मनुस्मृती है. अतिशुद्रों की
संख्या भारत में २७% है और शुद्रों या ओबीसी की संख्या ५०% है. इसलिए यदि अतिशूद्र
जागृत हो भी गये तो ब्राहमणों को विशेष धोका नहीं है, लेकिन यदि शुद्र जाग गये तो
ब्राहमणों की अवस्था गंभीर हो जायेगी और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा. इसलिये
संजीय जैसवाल जैसे मुर्ख लोगों को आगे करके शुद्र नाम की फिल्म में अतिशूद्र की
पीड़ा को दर्शा कर, वास्तविक शुद्र को भ्रमित करना, यह बाबासाहब के “हु वेर शुद्र?”
इस पुस्तक की हत्या है. इस प्रकरण को हमने ‘हत्या’ नाम इसलिए दिया है क्योंकि
फिल्म अथवा सिनेमा एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रचार माध्यम है. जनसामान्य लोग किताब पढ़ते
ही नहीं लेकिन वे सिनेमा वश्य देखते है. सिनेमा का प्रभाव दूरगामी एवं गहरा होता
है. उसका असर दीर्घकाल तक होता है. इसलिए ब्राहमणों ने ‘साईंबाबा’, ‘संतोषी माता’,
‘गणपति’, सारे देवी देवता को जनमानस तक सर्वदूर पहूँचाया है. साईं बाबा नमक फिल्म
ब्राहमण ‘मनोजकुमार’ गोस्वामी’ ने बना कर साईं नमक बदमाश ब्राहमण (नाना फडणविस) को
भारत में साईं नामक देवता के रूप में प्रसिध्द किया है. मानसशास्त्र का संशोधन है कि
चित्र स्वरुप में प्रदर्शित बातें मनुष्य मस्तिष्क पर दीर्घकाल तक गहरा प्रभाव
कराती है. इस मानसिक गुण का ब्राहमण ने पूरा उपयोग किया है.
शुद्रों को पूरी तरह से भ्रमित करने के लिये इस फिल्म में ‘जयभीम
हमारा नारा है, हमें गर्व है, हम शुद्र है’, ऐसा गाना डाला गया है, जिससे ओबीसी
समाज को प्रतीत होगा की ‘जयभीम’ बोलने वाले लोग ही ‘शुद्र’ है. यह फिल्म का टायटल
गीत है. (यह गाना उसने अभी निकल दिया है). इस गाने से साबित हो जाता है की ‘जयभीम’
लोंगों को शुद्र घोषित करवाना इस फिल्म का प्रमुख उददेश है. शुद्रों के विषय में
आरएसएस की यही निति एवं साजिश है. आरएसएस द्वारा ही इस फिल्म को बनाया गया है. यह
सिध्द करने के लिए और कौनसा सबुत चाहिए? इसके साथ ही ‘जयभीम’ का विशेष गाना भी अंत
में बताया गया है, ताकि ‘जयभीम’ के अंधविश्वासु लोंगों को आकर्षित किया जा सकें.
‘जयभीम’ के अंधविश्वासु लोग अर्थात वाचन न करनेवाले बाबासाहब के अनुयायी.
इस फिल्म में निर्माता ने ‘मनुस्मुति’ को समाज सुव्यवस्थित करनेवाला
ग्रंथ कहा है. (फिल्म के शुरुवात में ही). हमने उसे यह डॉयलाग बदलने को कहा था. आशा
है उसने यह डॉयलाग बदला होगा. फिल्म के अंत में उसने जातिव्यवस्था के कारण
होनेवाले अत्याचारों की तुलना दुनिया में रंगभेद के कारण होनेवाले अत्याचारों से
कर बाबासाहब के आंदोलन को अब्राहब लिंकन, मार्टिन ल्युथर, नेल्सन मंडेला, के
आंदोलन से की है. संक्षिप्त में बाबासाहब के आंदोलन का महत्व कम किया गया है.
बाबासाहब के वाचक अच्छी तरह से जानते है की जातिभेद के अत्याचारों की तुलना रंगभेद
के अत्याचारों से नहीं की जा सकती. इस विषय पर प्रश्न किये जाने पर उसने बताया की उसे
यह सिनेमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाना है. हमने उसे कहा कि अगर वह यह सिनेमा
सही मायने में बाबासाहब के विचारों एवं संशोधन पर आधारित बनाये तो सारा आंबेडकारी
समाज उसे सर पर उठायेगा. उसे इतना आदर, प्रेम और सन्मान मिलेगा की वह आज की तारीख
में सबसे प्रसिध्द व्यक्ति होगा. अंतरराष्ट्रीय ख्याति तो अपने आप ही मिलेगी. परंतु
आप उस व्यक्ति को ही समझा सकते है, जिसके शरीर पर उसका खुद का सिर होता है. जिसकी
बुद्धि दुसरो के यहाँ गिरवी रखी होती है, उस व्यक्ति को कैसे समझाये? संजीव जैसवाल
का जनसंपर्क अधिकारी एक ब्राहमण था. इससे क्या स्पष्ट रूपसे सिध्द नहीं होता की ‘’यदि
इस फिल्म के आगे ब्राहमण है तो, पीछे निश्चित रूप से आरएसएस होगी ही?”
संजीव जैसवाल ने
पिछले महीने, भारत के लगभग सभी राज्य के बहुजन नेता, संघटना, संस्था और उसीप्रकार
कॉलेज के विद्यार्थी एवं कर्मचारी संघटनाओं से मिलकर इस फिल्म की कुछ क्लिप्स
बताकर आकर्षित किया है. अत्याचार की घटनाओं का प्रभावी चित्रीकरण और ‘जयभीम’ का
गाना देखकर आंबेडकरी लोग उत्तेजित हो गये है. सामान्य लोग ही नहीं तो भारत के
नामचीन राजकीय अराजकीय अंबेडकरी नेता भी प्रभावित हो चुके है. कुछ दिन पहले उसने
दिल्ली के एक अंबेडकरी राजकीय नेता को भी भावनिक किया है. पिछले सप्ताह उसने
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ भेंट के फोटो फेसबुक पर डाले थे. आज ही उसने
बाबासाहब के घर जाकर उनके वंशजो से आशीर्वाद लेते हुए फोटो फेसबुक पर डाले है.
महाराष्ट्र के अंबेडकरी दैनिकपत्र भी उसे प्रसिद्धि दे रहे है. इन सारी बातों से
स्पष्ट होता है कि समाज में कितना अँधेरा फैला है. आज का आंबेडकरी समाज बाबासाहब
का अन्ध अनुयायी है. यह बाबासाहब के साथ धोखा है.
कुछ दिन पहले आरएसएस के लोगों ने
(बजरंग दल इत्यादि) यह फिल्म बंद करने और थियेटर तोड़ने की धमकी दिए जाने की खबर
सभी ओर फैलाई गई है. जिससे आंबेडकरी नेता और जनता यह फिल्म रिलीज करने के लिये और
जोश के साथ उछलकर खड़ी हो गई है. इस विषय में हमारा यह प्रश्न है कि जिस वक्त संजीव
जैसवाल ने यह फिल्म १४ अप्रैल २०१२ को रिलीज करना जाहिर किया था, उस समय आरएसएस ने
क्यों विरोध नहीं किया? तक़रीबन जनवरी से ही इस फिल्म की कई क्लिप्स फेसबुक पर प्रकाशित
की गई थी. आरएसएस ने उस वक्त या फिर अब तक ‘शुद्र’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की क्लिप्स
देखी नहीं होगी, क्या यह मान्य किया जा सकता है? अगर यह मान्य नहीं किया जा सकता,
तो फिर इस समय ही विरोध क्यों? इसका जवाब खोजने का काम हम वाचकों पर छोड़ देते है.
फिर भी, हमने कुछ बड़े आंबेडकरी नेताओं से बातें कर
यह विषय समझाने का भरकस प्रयास किया है, लेकिन हमें निराशा ही हात लगी. हमारी उनसे
सिर्फ इतनी ही विनती है कि उन्होंने इस फिल्म का नाम बदलकर ‘अतिशूद्र’ रखकर या फिल्म
में विशेष परिवर्तन करवाकर ही यह फिल्म रिलीज करने के लिये समर्थन देना चाहिए.
अन्यथा हाल के स्वरुप में यह फिल्म रिलीज हुई तो आम्बेडकरी गतिविधियों का ही नहीं
तो भारत का बड़ा नुकसान हुए बगैर नहीं रहेगा.
डॉ
परम आनंद,
८८०५४६०९९९
राष्ट्रीय
संयोजक,
भारत
लेनी संवर्धन समिति (ब्लिस)
डॉ
परम आनंद,
८८०५४६०९९९
राष्ट्रीय
संयोजक,
भारत
लेनी संवर्धन समिति (ब्लिस)









sir it is not readable to me. what font it is.
ReplyDeleteUnreadable. How can I read it?
ReplyDeleteIts really true.....
ReplyDeleteI Agree
ReplyDeleteI Agree
ReplyDelete